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Opinion: दुनिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुली का अस्तित्व ब्रह्मपुत्र व उसकी सखा-सहेली नदियों की बढ़ती लहरों से मिट्टी क्षरण या तट कटाव की गंभीर समस्या के चलते ही खतरे में हैं। हाल ही में रिमोट सेंसिंग से किए गए एक सर्वेक्षण में ब्रह्मपुत्र के अपने ही किनारों को निगलने की भयावह तस्वीर सामने आई हैं।

Opinion: बाढ़ तो असम में सदियों से चार महीने डेरा डाले रही है फिर भी वहां नदी से डर कर पलायन नहीं हुआ। बीते कुछ दशकों के दौरान पानी के बढ़ते भूमि कटाव ने इस राज्य में नए किस्म का विग्रह पैदा कर दिया है। असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे गांव-कस्बे साल दर साल सिकुड़ रहे हैं।

आंकड़ों का विश्लेषण
जलवायु परिवर्तन के गहराते संकट के चलते जब बारिश और गर्मी के अतिरेक व हिमनद पर निर्भर नदियों में अनियमित और बेमौसम तेज प्रवाह के चलते तटों का घुलकर पानी में समा जाना, बेहद गंभीर पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक स्थिति को उपजा रहा है। इंडियन जर्नल ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी के हाल ही के अंक 17 में केवल 'मोरईगांव' जिले में नदी से हो रहे कटाव के आंकड़ों का जो विश्लेषण किया गया है, उससे साफ जाहिर होता है कि जिले का बड़ा हिस्सा नदी उदरस्थ कर चुकी है और कोई बड़ी बात नहीं कि जल्दी इसका नामों- निशान मिट जाए।

आंकड़े बताते हैं कि इस जिले में नदी के बाएं तट पर सालाना भूमि कटाव 81.54 मीटर है जबकि दायें तट पर हर साल 83.59 मीटर धरती कट कर नदी में समा रही है। यहां कटाव के चलते नदी तेजी से अपनी राह बदल रही है और यह खेत, घर और सरकारी इमारतों को तबाह करती जा रही है। सदियों पहले नदियों के साथ बहकर आई जिस मिट्टी ने कभी असम राज्य का निर्माण किया, अब वही दूत, व्यापक जलधाराएं इस राज्य को बाढ़ व भूमि कटाव से श्रापित कर रही हैं।
इस साल बरसात की शुरुआत में ही डिब्रूगढ़ जिले में ऐथन के पास तिनखानग, माटिकाता में जमीन नदी में समा गई।

नदी-द्वीप माजुली का अस्तित्व
करीमगंज जिले के बराईगांव का अस्तित्व भी संकट में है। वैसे असम की लगभग 25 लाख आबादी ऐसे गांवो में रहती है जहां हर साल नदी उनके घर के करीब आ रही है। दुनिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुली का अस्तित्व ब्रह्मपुत्र व उसकी सखा-सहेली नदियों की बढ़ती लहरों से मिट्टी क्षरण या तट कटाव की गंभीर समस्या के चलते ही खतरे में हैं। हाल ही में रिमोट सेंसिंग से किए गए एक सर्वेक्षण में ब्रह्मपुत्र के अपने ही किनारों को निगलने की भयावह तस्वीर सामने आई हैं। सन 2019 में संसद में एक प्रश्न के उत्तर में जल संसाधन राज्य मंत्री रतनलाल कटारिया ने जानकारी दी थी कि अभी तक राज्य में 86536 लोग कटाव के चलते भूमिहीन हो गए। सोनितपुर जिले में 27,11 लोगों की जमीन नदी में समा गई तो मोरीगांव में 18,425, माजुली में 10500, कामरूप में 9337 लोग अपनी भूमि से हाथ धो बैठे हैं।

पिछले 50 सालों के दौरान नदी के पश्चिमी तट की 758.42 वर्ग किलोमीटर भूमि बह गई। इसी अवधि में नदी के दक्षिण किनारों का कटाव 758.42 वर्ग किमी रहा। भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि असम में नदी के कटाव को रोकने के लिए बनाए गए अधिकांश तटबंध जर्जर हैं और कई जगह पूरी तरह नश्ट हो गए हैं। एक मोटा अनुमान है कि राज्य में कोई 4448 किलोमीटर नदी तटों पर पक्के तटबंध बनाए गए थे ताकि कटाव को रेका जा सके लेकिन आज इनमें से आधे भी बचे नहीं हैं। बरसों से इनकी मरम्मत नहीं हुई, वहीं नदियों ने अपना रास्ता भी खूब बदला। भूमि कटाव का बड़ा कारण राज्य के जंगलों व आर्द्र भूमि पर हुए अतिक्रमण भी हैं। सभी जानते हैं कि पेड़ मिट्टी का क्षरण रोकते हैं और बरसात को भी सीधे धरती पर गिरने से बचाते हैं। आर्द्र भूमि पानी की मात्रा को बड़े स्तर पर नदी के जल-विस्तार को सोखते थे।

खरी-धुबरी नदी से छलके जल
राज्य की हजारों पुखरी-धुबरी नदी से छलके जल को साल भर सहेजते थे। दुर्भाग्य है कि ऐसे स्थानों पर अतिक्रमण का रोग ग्रामीण स्तर पर संक्रमित हो गया और तभी नदी को अपने ही किनारे काटने के अलावा कोई रास्ता नही दिखा। बेशक असम की भौगोलिक स्थिति जटिल है और वहां आने वाली तेज बाढ़ का असली कारण उसके पड़ोसी राज्य के पहाड़ों से आने वाला पानी का तेज बहाव है। चीन ने भी अपने कब्जे वाले ब्रह्मपुत्र के उद्गम पर कई विशाल बांध बनाए हैं और जैसे ही वहाँ क्षमता के अनुरूप पानी एकत्र हो जाता है, पानी को अनियमित तरीके से छोड़ दिया जाता है।

नदियों का अपना बहाव और फिर साथ में बांध से छोड़ा गया जल, इनकी गति तेज होती है और इससे जमीन का कटाव होना ही है। आज जरूरत है कि असम की नदियों में ड्रेजिंग के जरिये गहराई को बढ़ाया जाए। इसके किनारे से रेत उत्खनन पर रोक लगे। सघन वन भी कटाव रोकने में मददगार होंगे। असम का अस्तित्व बचाने के लिए उसके तटों की सुरक्षा के लिए दूरगामी योजना अनिवार्य है, जो यहां के जल और जन दोनों को बचा सके।
पंकज चतुर्वेदी: (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं. ये उनके अपने विचार हैं।)

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